मेरी रातों के पीछे एक भूरी बिल्ली रहती है कोशिश भी रहती है कि जिस भी कोने में फैली हो वो अपनी आलीन नींद के साथ वहाँ ना जाया जाए उसे छूने की इच्छा को दाँत पीस के दबा लिया जाये वो मेरा रंगीन फ़र्श उसपे एक जम्हाई सोफ़े के झरोखे में उलझे हुए कई नाख़ून मेरी कमीज़ की हर सिलवट के तले मुलायाम बाल भूरी बिल्ली कंबल में खो जाती है आरामखोर मेरी उँगलियों के चंगुल में मचलती है छिटक के छाती से होती हुई गोदी से मुड़ती हुई झपकते ही पहुंच जाती है बुकशेल्फ के ऊपर आँख से आँख मिलाऊँ तो "नीम!
Hatho ke palnemain soti hai meri bhuri billi ,wah.
Thank you Farah!!!!
Dhwani i want to hear it in your voice.
Aapka hukum, sar aankhon par!