जुगनू दादी की याद आ गयी
Jugnu dadi was married to my grandfather's youngest brother, Bhole paaji. Both left us during Covid.
एक कप घी, थोड़ी सी सर्दियों में आने वाली धूप, चार प्लेट बच्चों के गालों में रहने वाली cuteness, एक बोरी पहाड़ों में रहने वाली शांति, और दो चुटकी शैतानी - इन सब की बनी थीं जुगनू दादी ।
फ़र्ज़ कीजिये की आप रविवार की दोपहर को राजमा चावल खा के बैठे हैं। कहीं जाना नहीं है, किसी ने बुलाया नहीं है। बिस्तर पे आधे लेटे आधे बैठे हुए जो मन में आ रहा है share कर रहे हैं अपने दोस्त के साथ। आप दोनों की बातें दुनिया भर की सैर कर रही हैं बेफिक्री से।
ऐसा ही दोपहर नुमा होता था दादी के साथ बिताया हुआ हर पल। दोपहर की जम्हाई, दोपहर की नींद, दोपहर की ठहर जाने वाली शान्ति।
मुझे याद है, जब मेरा मन London जाके पढ़ने का हुआ, तो पापा ने हमारे घर में एक सभा बिठाई। सारे दादे, सारे चाचे, सारे बाप और एक जुगनू दादी। कई चीजों की बात हुई उस meeting में - what are the financial implications of this decision on the family? बाहर जाके पढ़ना ही है तो theatre क्यों पढ़ना है? अभी पढ़ने जाएगी, फिर आके कुछ साल काम भी करेगी? अरे वो सब छोड़ो, शादी कब करेगी? Business family वाले एक्टरों से शादी थोड़ी करते हैं ! I remember sitting in our drawing room in Sainik Vihar, quietly counting the minutes till the meeting would be over. मुझे नहीं सुननी discussion यार, मुझे result बताओ बस।
इसी बीच जुगनू दादी बोली, “Doctoraan नू डॉक्टर मिलदे ने, actoraan नू actor मिलेंगे। खुद ई लबेगी अपने लई कोई actor.1”
(Case in point, मैंने तब तक अपने लिए एक actor ढूंढ लिया था, न जाने कैसे दादी को सब पता होता था !)
Drawing room के एक कोने से दादी मुस्कुराई और दूसरे कोने से मैं। ऐसी feeling शायद नए पौधों को होती होगी, जब तेज़ बारिश में भी उनपे कोई छींट नहीं आती। ऊपर देखते होंगे तो दिखता होगा कि वो सदियों से खड़े बरगद की छांव में हैं।
मेरा रिश्ता दादी के साथ उसी दिन से बुनना शुरू हुआ। कम से कम मेरे लिए। वो मेरे समुद्र जैसे परिवार में मुझे एक कश्ति की तरह मिलीं। सबको नमस्ते करने के बाद जब उनसे मिलती थी तो मानो उनकी softness, उनके गदेलेपन में mix हो जाती थी। फिर पता चला उन्होंने masters किया हुआ है, english literature में। मैं कितनी उनके जैसी थी मुझे पता ही नहीं था!
बिना पूछे, बिना मांगे प्यार देते हुए देखा है मैंने दादी को। बिना हावी हुए, लोगों के सपने पूरे करते हुए भी देखा है। और आखिरी के दिनों में उन्हें दादी से बच्चा बनते हुए भी देखा है।
आज उन्हें गए हुए लगभग चार साल हो गए। उनकी याद आती भी है और नहीं भी आती। जब आती है तो बहुत हंसी आती है, मन खुश हो जाता है, अकेलापन बिलकुल गायब।
मैं थोड़ी थोड़ी उनके जैसी हो जाती हूँ, मेरी हँसी उनकी हँसी की तरह पूरे घर में गूंजती है।
Doctors find doctors, actors will find actors. She will find one actor for herself too.


What a tribute to jugnu dadi . Ek kashti si milti thi ,wah. Mujhe bhi laga ki ain dopahar ki chaon main hun
Farah ji thank you ji. Jugnu dadi thi hi itni pyaari!